नयी दिल्ली: एक अक्टूबर (ए) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि शारीरिक हिंसा, धमकी या दबाव के डर के साये में काम कर रहे चिकित्सक से सही और स्वतंत्र निर्णय लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
अदालत ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र के ठाणे जिले के एक नगर निगम अस्पताल में चिकित्सकों के साथ मारपीट और गाली-गलौज के आरोपी शिवसेना के निगम पार्षद रमेश म्हात्रे और तीन अन्य की जमानत रद्द करते हुए की। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 28 सितंबर के मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए जमानत रद्द कर दी।
पीठ ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि शारीरिक हिंसा, धमकी या दबाव का इस्तेमाल चिकित्सा उपचार से असंतोष जताने, किसी मांग को मनवाने या इलाज के प्रतिकूल परिणाम को लेकर शिकायत करने के तरीके के रूप में नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा, ‘‘शारीरिक हिंसा, धमकी या दबाव के डर के बीच काम कर रहे चिकित्सक से सही और स्वतंत्र निर्णय लेने की उचित रूप से उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए, चिकित्सा पेशेवर की सुरक्षा और गरिमा व्यक्तिगत विशेषाधिकार का विषय नहीं है। ये व्यापक जनहित की रक्षा करने वाले उपाय हैं, ताकि चिकित्सा सेवा उस एकाग्रता, संयम और विवेक के साथ दी जा सके, जिसकी इस पेशे से अपेक्षा की जाती है।’’
अदालत ने म्हात्रे और उसके तीन सहयोगियों (रमेश लक्ष्मण पवार, प्रमोद उर्फ प्रकाश उद्धव निकम और अक्षय शरद करांडे) को पांच अक्टूबर तक निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। इन तीनों को भी इस मामले में जमानत मिली थी।
चारों पर छह जुलाई को डोंबिवली के शास्त्री नगर स्थित निगम अस्पताल के प्रसव कक्ष में ड्यूटी पर तैनात एक महिला चिकित्सक समेत तीन चिकित्सकों के साथ मारपीट करने और गाली-गलौज करने का आरोप है।
पीठ ने कहा कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को जनता की सेवा करने और उन संस्थानों को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, जिनके माध्यम से शिकायतों का समाधान किया जाता है और न्याय प्रदान किया जाता है।
उच्च न्यायालय ने सात अगस्त को म्हात्रे को जमानत दे दी थी और मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने तथा उसे समयबद्ध तरीके से पूरा करने का आदेश दिया था।
