नयी दिल्ली: 23 फरवरी (ए)
बीएनएस की धारा 69 कपटपूर्ण तरीकों से यौन संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी में रखती है। इन तरीकों में, शादी का झूठा वादा करना, नौकरी या पदोन्नति का झूठा आश्वासन देना, या अपनी पहचान छिपाना शामिल हैं।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने एक ऐसे व्यक्ति को जमानत देने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की, जिस पर एक महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने और बाद में कुंडली मिलान नहीं होने के आधार पर उससे शादी से इनकार करने का आरोप है।
न्यायाधीश ने पाया कि आरोपी द्वारा पीड़िता को बार-बार यह आश्वासन देने पर कि उनकी शादी में कोई अड़चन नहीं है, जिसमें कुंडली मिलान भी शामिल है, एक अवधि के दौरान शारीरिक संबंध बनाये गए थे। अदालत ने कहा कि इसलिए, ऐसे में आरोपी के आचरण को बीएनएस की धारा 69 के तहत अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है।
चार जनवरी से न्यायिक हिरासत में बंद आरोपी ने इस आधार पर जमानत मांगी कि उनके बीच संबंध आपसी सहमति से थे, और दोनों एक-दूसरे को आठ साल से जानते थे।
उसके वकील ने दलील दी कि शादी का झूठा वादा करके बलात्कार का मामला नहीं बनता है और उसे नियमित जमानत मिलनी चाहिए।
अदालत ने 17 फरवरी को पारित अपने आदेश में कहा कि पीड़िता द्वारा पहली शिकायत नवंबर 2025 में दायर की गई थी, लेकिन आरोपी और उसके परिवार द्वारा कथित तौर पर दिये गए विवाह के आश्वासन पर ही इसे वापस ले लिया गया था तथा बाद में कुंडली मिलान न होने के आधार पर शादी से इनकार कर दिया गया था।
जनवरी 2026 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 (बलात्कार) और बीएनएस की धारा 69 के तहत अपराधों के सिलसिले में मौजूदा प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
अदालत ने कहा कि घटनाक्रम से यह महज ‘‘रिश्ता टूटने’’ का मामला नहीं है, बल्कि कुंडली मिलान पर परिवार के जोर देने की आवेदक को जानकारी रहने के बावजूद शादी का बार-बार आश्वासन दिए जाने का मामला है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती कि महज किसी रिश्ते के टूटने या शादी न होने के कारण आपराधिक कानून लागू नहीं हो सकता। हालांकि, वर्तमान मामला इस स्तर पर एक अलग स्थिति वाला है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘कुंडली मिलान न होने के आधार पर शादी से इनकार करना, पहले दिये गए आश्वासनों के बावजूद, आवेदक द्वारा किये गए वादे की प्रकृति और प्रामाणिकता पर प्रथम दृष्टया प्रश्नचिह्न लगाता है।’’ अदालत ने कहा कि ऐसा आचरण बीएनएस की धारा 69 के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है।
उच्च न्यायालय ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि आरोपों की प्रकृति, जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री और इस तथ्य पर गौर करते हुए कि मामले में अब तक आरोपपत्र दाखिल नहीं किया गया है, अदालत राहत देने को इच्छुक नहीं है।