नयी दिल्ली: 12 फरवरी (ए)
शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए खरगे ने कहा कि ओडिशा में एक समुदाय के लोग अपने बच्चों को दलित आंगनवाड़ी कार्यकर्ता द्वारा बनाए गये भोजन का सेवन नहीं करने दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों के शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास की नींव हैं। उन्होंने कहा, “ऐसा भेदभाव बच्चों के विकास को प्रभावित करेगा और यह संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत दिए गए शिक्षा के अधिकार को भी प्रभावित करता है।”
खरगे ने कहा कि कार्यस्थलों पर जातिगत भेदभाव देश के कई हिस्सों में लगातार सामने आ रहा है। उन्होंने कहा, “यदि समय पर जांच की जाती, तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था।”
उन्होंने मध्यप्रदेश के एक मामले का भी जिक्र किया, जहां कुछ साल पहले एक व्यक्ति ने एक आदिवासी व्यक्ति पर कथित तौर पर पेशाब किया था। उन्होंने दावा किया कि गुजरात में पिछले साल एक दलित सरकारी अधिकारी ने जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली थी।
खरगे ने कहा कि ये घटनाएं दर्शाती हैं कि जाति आधारित भेदभाव केवल सामाजिक और राजनीतिक जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यस्थलों में भी मौजूद है। ‘‘इसका प्रभाव लोगों की गरिमा, करियर में प्रगति और व्यक्तिगत सुरक्षा पर पड़ता है।’’
खरगे ने कहा कि किसी के भी खिलाफ जातिगत भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 का उल्लंघन है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लिया जाए और समयबद्ध जांच की जाए।