नयी दिल्ली: 25 जुलाई (ए)
दीपके ने कहा, “यह इस्तीफा इस बात का सबूत है कि अगर आप डरेंगे नहीं, इस सरकार के सामने झुकेंगे नहीं, तो इस्तीफा ले सकते हैं। अगर आपको बोलने से डर लगे, तो फिर यह लोकतंत्र कैसा?… उन्हें लगता है कि वे राजा हैं, क्योंकि उन्हें वहां हमने ही भेजा है।”
कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के 30 वर्षीय संस्थापक के लिए यह इस्तीफा कभी भी कहानी का अंत नहीं था।
उन्होंने भीड़ से कहा, “यह पहला विकेट है। यह तो सिर्फ शुरुआत है।”
राजनीतिक जीत को लोकतांत्रिक भागीदारी के बड़े मुद्दे से जोड़ने की यही क्षमता शायद बताती है कि जो व्यक्ति महज दो महीने पहले तक अमेरिका में नौकरी के लिए आवेदन कर रहा था, वही एक ऐसा आंदोलन खड़ा करने में सफल रहा, जिसने एक केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा के लिए मजबूर कर दिया।
जून की शुरुआत में जब ‘समाचार एजेंसी ने उनका साक्षात्कार किया था, तब दीपके बोस्टन से भारत लौटने की तैयारी कर रहे थे।
वहां उन्होंने जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिग्री पूरी की थी। दीपके को उम्मीद थी कि भारत पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
उन्होंने कहा था, “संभवतः मुझे हवाई अड्डे से ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा।”
कॉजपा के संस्थापक ने याद करते हुए बताया कि कुछ ही सप्ताह पहले तक वह विदेश में अपना करियर बनाने की योजना बना रहे थे।
कॉजपा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान बढ़ने के बाद अमेरिका और यूरोप की कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उन्हें नौकरी की पेशकश की, लेकिन उन्होंने सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए।
इस फैसले ने न सिर्फ उनकी जिंदगी बदल दी, बल्कि भारत की राजनीतिक चर्चा की दिशा भी बदल दी।
बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ से किए जाने के बाद व्यंग्य के रूप में जन्मी कॉजपा तेजी से उस रूप में विकसित हुई, जिसे दीपके ‘राजनीतिक युवा आंदोलन’ कहना पसंद करते हैं।
शुरुआत में उनका कहना था कि कॉजपा की लोकप्रियता उनकी व्यक्तिगत पहचान की वजह से नहीं, बल्कि युवाओं की बेरोजगारी, शिक्षा और उनकी आकांक्षाओं जैसे मुद्दों पर राजनीतिक व्यवस्था की नाकामी का परिणाम है।
उन्होंने ‘ कहा था, “यह राजनीतिक व्यवस्था की विफलता है कि वह युवाओं की आकांक्षाओं, जरूरतों, चिंताओं और उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकी। युवाओं ने ऐसे दल का साथ दिया, जिसका जन्म व्यंग्य से हुआ था। इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है।”
यही सोच आज भी उनकी राजनीति की पहचान बनी हुई है।
शनिवार को जंतर-मंतर पर इस्तीफे के जश्न के नारे गूंज रहे थे, लेकिन दीपके बार-बार चर्चा को व्यक्तियों से हटाकर मुद्दों पर ले जाने की कोशिश करते रहे।
उन्होंने कहा, “युवाओं ने दिखा दिया है कि अगर वे ठान लें, तो किसी से भी इस्तीफा दिलवा सकते हैं। जो लोग कहते थे कि यह सरकार कभी किसी की नहीं सुनती, वे गलत साबित हुए हैं।”
दीपके ने इसके बाद सबसे स्पष्ट शब्दों में बताया कि वह इस आंदोलन को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।
उन्होंने कहा, “अगर हिंदू-मुस्लिम की राजनीति नहीं होगी और मुद्दों की राजनीति होगी, तो सत्ता की कुर्सियां हिल जाएंगी। इस देश का युवा हिंदू-मुस्लिम की राजनीति के जाल में नहीं फंसेगा। वह रोजगार की बात करेगा।”
शुरुआत से इस आंदोलन को देखने वाले लोगों का कहना है कि व्यक्ति पूजा की राजनीति से दूरी बनाए रखने की यह सोच पूरे आंदोलन के दौरान साफ दिखाई दी।
दीपके इस बात पर जोर देते रहे कि केवल विद्यार्थियों की मांगों से जुड़े नारे ही लगाए जाएं।
जब समर्थकों ने एक मौके पर उनके समर्थन में नारे लगाने शुरू किए, तो उन्होंने तुरंत उन्हें रोक दिया और कहा कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि विद्यार्थियों का है।
शनिवार को उन्होंने जीत का ऐलान करने के बजाय आंदोलन की मांगों को और व्यापक बनाने पर जोर दिया।
उन्होंने प्रधान के इस्तीफे को आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों के लिए ‘‘न्याय’’ करार देते हुए 20 जुलाई की हिंसा में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई, प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग की।
दीपके ने मुस्कराते हुए कहा, “एक कॉकरोच एक बार कहीं घुस जाए, तो इतनी आसानी से बाहर नहीं निकलता।”
इसके बाद उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर हमला करने का आरोप लगाते हुए पुलिस अधिकारियों को चेतावनी दी, “अगर हम एक मंत्री का इस्तीफा दिला सकते हैं, तो तुम कौन हो? कॉकरोच से पंगा मत लेना।”
दीपके का अपना सफर भी पारंपरिक राजनीतिक नेता की छवि से काफी अलग रहा है।
महाराष्ट्र के एक दलित परिवार में जन्मे दीपके ने जनसंचार एवं पत्रकारिता की पढ़ाई की और इसके बाद वह जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिग्री करने के लिए अमेरिका के बोस्टन विश्वविद्यालय चले गए।
‘कॉजपा’ की स्थापना से पहले दीपके राजनीतिक संचार के क्षेत्र में काम करते थे।
वर्ष 2020 से 2023 के बीच उन्होंने आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम के साथ स्वयंसेवक के रूप में भी काम किया।
इस दौरान उन्होंने डिजिटल अभियान और ऑनलाइन राजनीतिक संदेश तैयार करने में मदद की।
दीपके के माता-पिता ने शनिवार को कहा कि पिछले 40 दिन से उन्हें चैन की नींद नहीं आई।
उन्होंने कहा कि उनका बेटा प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहा था, पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहा था और उसे लगातार धमकियां मिल रही थीं, जिससे वे लगातार चिंतित रहे।
दीपके ने खुद कॉजपा के राजनीतिक भविष्य से जुड़े सवालों का जवाब देने से परहेज किया।
उन्होंने कहा, “युवा जाग चुके हैं। लोकतंत्र की नई सुबह हो चुकी है।”