प्रयागराज: 29 अक्टूबर (ए) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में सुनवाई के दौरान मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए कहा है कि पत्नी, नाबालिग बच्चों और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण करना व्यक्ति का ‘‘पवित्र कर्तव्य’’ है।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने कानपुर नगर की एक परिवार अदालत द्वारा निर्धारित गुजारा भत्ते की राशि बढ़ाने के अनुरोध वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई के दौरान मनुस्मृति के अध्याय 11 के श्लोक 10 का उल्लेख किया।यह याचिका पिंकी वर्मा नाम की महिला ने दायर की थी।
अदालत ने इस श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्नी, नाबालिग बच्चों और माता-पिता का भरण-पोषण करना पति का न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है।
उच्च न्यायालय ने 22 अक्टूबर को दिए अपने आदेश में उच्चतम न्यायालय के अंजू गर्ग मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया। शीर्ष अदालत ने उस फैसले में कहा था कि पति का ‘‘पवित्र कर्तव्य’’ है कि वह वैध तरीकों से कमाई करके अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चों को आर्थिक सहारा दे।
उच्च न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण का अधिकार एक सामाजिक कल्याणकारी उपाय है, जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को बेसहारा होने और घोर गरीबी की स्थिति में पहुंचने से बचाना है।
अदालत ने कहा कि विवाह को कानूनी मान्यता मिलने और पत्नी द्वारा अपना भरण-पोषण करने में असमर्थता साबित कर देने के बाद पति की आर्थिक जिम्मेदारी बनी रहती है, भले ही पुरानी मान्यताएं कुछ भी रही हों।
सुनवाई के दौरान पति ने दलील दी कि वह अपने वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए देने को तैयार है जिस पर अदालत ने इंडियन बैंक के संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि पति के सकल वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी के बैंक खाते में जमा किया जाए।
