कोच्चि (केरलम): एक नवंबर (ए) प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने रविवार को न्यायिक प्रक्रिया में तत्परता बढ़ाने की गुंजाइश पर आत्ममंथन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वादियों के बीच उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की तत्काल सुनवाई या जल्द सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों की संस्थागत स्वायत्तता का हमेशा सम्मान किया है, जिसमें अपना ‘रोस्टर’ तय करने का उनका अधिकार भी शामिल है।
उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, इस तरह के अनुरोधों की बढ़ती संख्या हमें यह विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि क्या हमारी प्रक्रियाओं में तत्परता बढ़ाने की गुंजाइश है।’’
केरल उच्च न्यायालय की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने सवाल किया, ‘‘क्या तत्काल सुनवाई वाले मामलों की अधिक प्रभावी ढंग से पहचान की जा सकती है? क्या सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और पूर्वानुमान योग्य बनाया जा सकता है? क्या प्रौद्योगिकी उन मामलों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकती है, जिनमें देरी से अपूरणीय नुकसान हो सकता है? और क्या हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि समय पर न्याय पाने के लिए किसी वादी की पहुंच इस बात पर निर्भर न हो कि वह राष्ट्रीय राजधानी तक यात्रा कर सकता है या नहीं?’’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि भारत में संवैधानिक न्याय नयी दिल्ली से शुरू होकर वहीं समाप्त नहीं होता, बल्कि इसकी ताकत देश भर में फैले 25 संवैधानिक उच्च न्यायालयों के मजबूत नेटवर्क में निहित है, जिनमें से प्रत्येक को अधिकारों की रक्षा करने और कानून का शासन कायम रखने का दायित्व सौंपा गया है।
उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय आम लोगों की रोजमर्रा की वास्तविकताओं से गहराई से जुड़े हुए हैं, क्योंकि वे स्थानीय शिकायतों की भाषा, क्षेत्रीय समुदायों की परिस्थितियों और सरकारी कार्रवाई के व्यावहारिक परिणामों को समझते हैं।
