नयी दिल्ली: तीन जुलाई (ए)
भारती कॉलेज की पूर्व सहायक प्रोफेसर अंकिता किल्सेन द्वारा दायर शिकायत पर सुनवाई करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट गौरव कटारिया ने कहा कि आरोपों से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का पता चलता है, जिनकी विस्तृत पुलिस जांच आवश्यक है।
अदालत ने एक जुलाई के अपने आदेश में कहा, ‘‘किसी कृत्य को आपराधिक बनाने वाला तत्व उसके पीछे मौजूद धोखाधड़ी का इरादा होता है। इस मामले में ऐसा इरादा शुरू से ही स्पष्ट प्रतीत होता है। कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार किया जाना… तीनों आरोपियों की बेईमान और धोखाधड़ीपूर्ण मंशा की ओर संकेत करता है।’’
अदालत ने शालीमार बाग पुलिस थाने के प्रभारी (एसएचओ) को पांच नवंबर, 2024 को दायर शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने और 30 दिन के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
शिकायत में जिन लोगों को आरोपी बनाया गया है उनमें खुद को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) का वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी बताने वाले संजीव कुमार दयाल सिंह, कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर प्रमोद कुमार और भारती कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर ल्यूक खन्ना शामिल हैं।
शिकायत के अनुसार, 2021 में संजीव कुमार ने शिकायतकर्ता की मुलाकात दोनों एसोसिएट प्रोफेसरों से यह भरोसा दिलाकर कराई थी कि वे उन्हें सहायक प्रोफेसर का पद दिलाने में मदद करेंगे।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि दोनों एसोसिएट प्रोफेसरों ने शोधपत्रों के प्रकाशन शुल्क और यात्रा व्यय के नाम पर उससे एक लाख रुपये नकद लिए तथा प्रतिष्ठित अकादमिक पत्रिकाओं में उन्हें प्रकाशित कराने का भरोसा देकर उसके शोधपत्रों की मूल प्रतियां अपने पास रख लीं।
शिकायतकर्ता ने दावा किया कि बाद में उसे कथित तौर पर प्रकाशित तीन शोधपत्रों की फोटोकॉपी और उनके प्रकाशन प्रमाणपत्र दिए गए, जिनके आधार पर उसने शिक्षण पदों के लिए आवेदन किया।
शिकायतकर्ता की नवंबर 2023 में भारती कॉलेज के राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति हुई थी।
हालांकि, अगस्त 2024 में कॉलेज ने अंकिता को बताया कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी से पता चला है कि उसके द्वारा जमा किए गए शोध प्रकाशन कथित तौर पर फर्जी हैं। इसके बाद उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और जांच समिति द्वारा तीनों शोध प्रकाशनों को फर्जी पाए जाने के बाद अक्टूबर 2024 में उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में आरोपियों में से एक ने मामला रफा-दफा करने और उसकी नौकरी बरकरार रखने का भरोसा देकर 25 लाख रुपये की मांग की।
इस मामले में शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रदीप खत्री ने पैरवी की, जबकि अधिवक्ता प्रांजल भास्कर ने उनकी सहायता की।
इससे पहले पुलिस द्वारा दाखिल की गई कार्रवाई रिपोर्ट में इस विवाद को दीवानी प्रकृति का बताया गया था और कहा गया था कि इसमें कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
हालांकि, अदालत ने पुलिस के इस निष्कर्ष को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया ऐसा मामला बनता है, जिसकी विधिवत पुलिस जांच की जानी आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि यह पता लगाने के लिए भी जांच जरूरी है कि क्या नौकरी की तलाश कर रहे अन्य अभ्यर्थी भी इसी तरह के कथित संगठित गिरोह का शिकार हुए हैं।