मासिक धर्म स्वास्थ्य मौलिक अधिकार का हिस्सा; मुफ्त सैनिटरी पैड, पृथक शौचालय उपलब्ध कराएं: शीर्ष न्यायालय

राष्ट्रीय
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नयी दिल्ली: 30 जनवरी (ए)) मासिक धर्म स्वास्थ्य को संविधान के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा बताते हुए उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे छात्राओं को बिना किसी शुल्क के जैविक रूप से अपघटनीय सैनिटरी पैड उपलब्ध कराएं तथा लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करें।

लैंगिक न्याय और शैक्षिक समानता सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक फैसले में, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कई निर्देश जारी करते हुए कहा कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ये सुविधाएं सभी स्कूलों में उपलब्ध हों, चाहे वे सरकारी हों, सहायता प्राप्त हों या निजी स्कूल हों।न्यायालय ने कहा, ‘‘मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का एक हिस्सा है।

इसने कहा कि यदि निजी स्कूल ये सुविधाएं प्रदान करने में विफल रहते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी।

न्यायालय ने यह भी कहा कि अगर सरकारें भी लड़कियों को शौचालय और मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने में विफल रहती हैं, तो वह उन्हें जवाबदेह ठहराएगा।

शीर्ष अदालत ने 10 दिसंबर, 2024 को जया ठाकुर द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसमें स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता संबंधी केंद्र सरकार की नीति को कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में अखिल भारतीय स्तर पर लागू करने की मांग की गई थी।