नयी दिल्ली, 15 अक्टूबर (ए) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि आपराधिक कानून के तहत किसी महिला पर सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया जा सकता है भले ही उसने खुद यह कृत्य नहीं किया हो लेकिन अगर उसने पीड़िता से दुष्कर्म में आरोपियों की मदद की हो।
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने एक महिला की उस याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया जिसमें उसने अपनी नाबालिग बेटी को सह-आरोपी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए कथित तौर पर मजबूर करने के मामले में आरोप तय किए जाने को चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘यह मानने का कोई आधार नहीं है कि किसी महिला पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376डी और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 70 के तहत सामूहिक दुष्कर्म का आरोप नहीं लगाया जा सकता। इस फैसले में उठाए गए सवाल का जवाब इसी के अनुरूप दिया जाता है।’’
अदालत उस सवाल पर विचार कर रही थी कि ‘‘क्या किसी महिला पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376डी और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 70 के तहत सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया जा सकता है।’’
भारतीय न्याय संहिता की धारा 70 (सामूहिक दुष्कर्म) के अनुसार यदि एक महिला से एक या अधिक व्यक्तियों का समूह दुष्कर्म करता है या इसके लिए वे साझा मंशा के तहत काम करते हैं तो उनमें से प्रत्येक को दुष्कर्म का दोषी माना जाएगा।
इस अपराध के लिए कम से कम 20 साल के कठोर कारावास की सजा का प्रावधान है जिसे बढ़ाकर आजीवन कारावास यानी व्यक्ति के शेष प्राकृतिक जीवनकाल तक कारावास किया जा सकता है और साथ ही उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा।’’बीएनएस की धारा 70 की व्याख्या करते हुए न्यायमूर्ति भंभानी ने कहा कि अदालत की राय में ‘‘दुष्कर्म का अपराध करने वाला माना जाएगा’’ वाक्यांश का इस्तेमाल विधायिका की मंशा को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। इसका मतलब है कि सामूहिक दुष्कर्म के आरोप का सामना करने के लिए समूह के प्रत्येक व्यक्ति या साझा मंशा के तहत काम करने वाले व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से दुष्कर्म करे यह जरूरी नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके फैसले का यह मतलब नहीं है कि अपराध में अकेले शामिल किसी महिला पर सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया जा सकता है। उसने यह भी कहा कि वह इस सवाल पर कोई राय नहीं दे रही है कि 2013 के बाद संशोधित आईपीसी की धारा 375 या बीएनएस की धारा 63 में इस्तेमाल किया गया शब्द ‘पुरुष’ लैंगिक रूप से तटस्थ है या नहीं।
यह मामला जुलाई 2024 में दिल्ली के भलस्वा डेयरी थाने में दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, नाबालिग लड़की ने आरोप लगाया कि उसकी मां ने उसे धमकाया और अन्य आरोपी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। लड़की ने यह भी आरोप लगाया कि दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच उसका बार-बार यौन उत्पीड़न किया गया।
पीड़िता ने बताया कि जुलाई 2024 में जब उसकी मां ने उसे दोबारा अन्य आरोपी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए धमकाया तो वह घर छोड़कर चली गई।
महिला की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि बीएनएस की धारा 63 में दुष्कर्म की परिभाषा में अपराध करने वाले के रूप में स्पष्ट रूप से पुरुष का उल्लेख है। इसलिए किसी महिला पर सामूहिक दुष्कर्म के मामले में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
हालांकि न्यायमित्र के रूप में अदालत की मदद कर रहे वकील रोहन जे. अल्वा ने कहा कि किसी व्यक्ति को आरोपी बनाया जाए या नहीं, यह तय करते समय उसका पुरुष या महिला होना महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए। यदि वह व्यक्ति समूह का हिस्सा था और अपराध को अंजाम देने में उसकी भूमिका थी, तो उस पर भी आरोप लगाया जा सकता है।
