नयी दिल्ली: 11 जनवरी (ए)
) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि हिरासत में लेने वाले अधिकारी की यह आशंका कि यदि किसी बंदी को जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह लोक व्यवस्था के लिए प्रतिकूल अपराधों में फिर से लिप्त हो सकता है, एहतियाती हिरासत का आदेश देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने हैदराबाद की एक महिला की हिरासत के आदेश को रद्द कर दिया, जिसे 1986 के तेलंगाना ‘खतरनाक गतिविधियों की रोकथाम’ कानून के तहत तस्करी में लिप्त पाया गया था।पीठ ने यह फैसला इस आधार पर लिया कि हिरासत के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि लोक व्यवस्था पर किस प्रकार से प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था या पड़ने की आशंका थी, जिसके कारण बंदी को हिरासत में रखा गया था।
पीठ ने आठ जनवरी के अपने आदेश में कहा, ‘‘इस प्रकार, हिरासत में लेने वाले अधिकारी की ओर से सिर्फ यह आशंका कि यदि बंदी को जमानत पर रिहा कर दिया जाता है, तो वह इस प्रकार के अपराधों में लिप्त हो सकती है, जो लोक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह होंगे, उसे निवारक हिरासत में रखने का पर्याप्त आधार नहीं होगा।’’
पीठ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के आदेश को भी रद्द कर दिया और कहा कि बंदी को 1986 के कानून की धारा 2 (एफ) के तहत ‘‘नशीली दवाओं की तस्कर’’ पाया गया।
पीठ ने कहा कि कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट का भी यह मानना था कि बंदी ने जमानत के लिए आवेदन दिया है, जो लंबित है और यह आशंका थी कि यदि बंदी जमानत प्राप्त करने में सफल हो जाती है, तो वह अवैध गतिविधियों में लिप्त हो जाएगी।