नयी दिल्ली: 21 जनवरी (ए
) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि अवैध खनन से अपूरणीय क्षति हो सकती है, इसलिए वह अरावली में खनन और संबंधित मुद्दों की व्यापक एवं समग्र जांच के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक समिति गठित करेगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और न्यायमित्र के. परमेश्वर को चार सप्ताह के भीतर खनन क्षेत्र के विशेषज्ञ पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के नाम सुझाने का निर्देश दिया, ताकि विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सके।
पीठ ने कहा कि समिति इस न्यायालय के निर्देशन और निगरानी में कार्य करेगी।
उच्चतम न्यायालय ने अपने उस आदेश को भी विस्तारित किया, जिसमें अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार करने वाले 20 नवंबर के निर्देशों को स्थगित रखा गया था।
सुनवाई के दौरान न्यायालय को सूचित किया गया कि छिटपुट स्थानों पर अवैध खनन हो रहा है, और पीठ ने राजस्थान सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज के इस आश्वासन को रिकॉर्ड में लिया कि इस तरह का कोई भी अनधिकृत खनन नहीं होगा।
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर उठे विवाद के बीच, उच्चतम न्यायालय ने ‘अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा तथा उससे जुड़े मुद्दे’ शीर्षक से इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था।
अरावली की नई परिभाषा को लेकर जारी बवाल के बीच, न्यायालय ने पिछले साल 29 दिसंबर को अपने 20 नवंबर के उन निर्देशों को स्थगित कर दिया था, जिनमें इन पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था।
इन निर्देशों में अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा स्वीकार की गई थी। न्यायालय ने कहा था कि कुछ गंभीर अस्पष्टताओं का समाधान ज़रूरी है, जिनमें यह आशंका भी शामिल है कि 100 मीटर ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी के मानक से अरावली का बड़ा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण से बाहर हो सकता है।
न्यायालय ने 20 नवंबर को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार कर लिया था और विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैले इसके क्षेत्रों के भीतर नए खनन पट्टे देने पर प्रतिबंध लगा दिया था।