नयी दिल्ली: 24 मई (ए)
तीनों मामलों में, परिवारों ने आरोप लगाया कि ससुराल वालों ने पैसों और उपहारों के रूप में दहेज की मांग की और उनकी बेटियों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। उपहारों और भव्य पार्टियों के रूप में दहेज को आज भी कलंक नहीं माना जाता, जबकि तलाक को माना जाता है।
भारत में प्रतिदिन औसतन 16 महिलाएं दहेज के कारण अपनी जान गंवाती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2024 में दहेज से संबंधित 5,737 मौत हुईं, जो वर्ष 2023 के 6,156 मामलों से कम है, लेकिन फिर भी प्रति माह 478 मौत दर्ज की गईं।
त्विषा, दीपिका और पलक इस सांख्यिकीय पहेली का एक छोटा सा हिस्सा थीं, लेकिन महत्वपूर्ण उदाहरण थीं। कानूनी ढांचा मौजूद है, लेकिन भारी देरी के कारण महिलाओं में विश्वास जगाने और सामाजिक मानदंडों को बदलने के प्रयासों में बाधा उत्पन्न होती है।
उनकी मृत्यु से नैतिक और कानूनी दोनों तरह के सवाल उठते हैं: उनके परिवार के लोग उन्हें घर क्यों नहीं ले जा सके? उन्होंने मदद क्यों नहीं मांगी? क्या कानून उनके पक्ष में नहीं है? क्या उन्हें कभी न्याय मिलेगा?विशेषज्ञों के अनुसार, जवाब से एक ऐसी सामाजिक संरचना का पता चलता है जो मनोवैज्ञानिक रूप से उन्हें तैयार करती है, शालीनता की अपेक्षाओं और सामाजिक शर्म के माध्यम से एक महिला की स्वायत्तता को प्रतिबंधित करती है, और एक कानूनी तंत्र जो मजबूत होने के बावजूद लंबित दहेज हत्या के मामलों के लगातार बढ़ते ढेर और कम दोषसिद्धि दरों से बोझिल है।
फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिक डॉ. दीप्ति पुराणिक कहती हैं, “ऐसा नहीं है कि फिलहाल मैं बाहर नहीं निकल सकती, मैं निकल सकती हूं। मेरे पास पैसा है और सब कुछ है। बात बस इतनी सी है कि ‘क्या मेरे पास बाहर निकलने का विकल्प है?’ ‘क्या लोग मुझे स्वीकार करेंगे?’ तो भले ही आप आर्थिक रूप से स्वतंत्र महसूस करते हों, लेकिन क्या आप मानसिक रूप से स्वतंत्र महसूस करते हैं?”
मुंबई के नरसी मोंजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज की एसोसिएट प्रोफेसर पुराणिक ने कहा, “फिर परिवार और बच्चों जैसे कारक भी हैं। तो क्या व्यक्ति वास्तव में बाहर निकलने का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है… यह अपने आप में एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है।”
उनके अनुसार, महिलाओं को विवाह संबंधी कुछ ऐसी मान्यताओं के साथ पाला-पोसा जाता है जो उन्हें विषाक्त विवाहों से बाहर निकलने में मानसिक रूप से असमर्थ बना देती हैं। सामाजिक कलंक के इसी जाल में फंसी होने के कारण, माता-पिता भी अक्सर कोई खास मदद नहीं करते।
तीनों महिलाओं के विवाह के शुरुआती दिनों में ही निराशा छा गई, और मृत्यु से पहले के घंटों और दिनों में प्रत्येक ने अपने परिवार से संपर्क साधा।
पांच महीने की तनावपूर्ण शादी के बाद 12 मई को त्विषा अपने ससुराल में फंदे से लटकी हुई पाई गई। उसी दिन, उसी तरह, पलक ने ग्वालियर में शादी के एक साल के भीतर आत्महत्या कर ली। पांच दिन बाद, सैकड़ों किलोमीटर दूर, 17 मई को, दीपिका ने कथित तौर पर अपने ससुराल वालों के ग्रेटर नोएडा स्थित घर से कूदकर जान दे दी। इससे पहले उसके माता-पिता उसकी फोन कॉल के बाद उनमें सुलह कराने की कोशिश के लिये ससुराल भी गये थे।
उनकी कहानियां एक ही ढर्रे पर चलती प्रतीत होती हैं।
खबरों के मुताबिक, एमबीए ग्रेजुएट और मॉडल त्विषा अपनी मौत से कुछ घंटे पहले तक अपने परिवार के संपर्क में थीं और उनसे उन्हें घर ले जाने की गुहार लगा रही थीं। ऑनलाइन लीक हुई कथित चैट में, 33 वर्षीय त्विषा अपनी मां को अपनी परेशानियों के बारे में बताती थीं।
पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में दीपिका के पिता संजीव नागर ने आरोप लगाया कि 17 मई की दोपहर को उन्हें बेटी का फोन आया, जिसमें वह रो रही थी और उसने बताया कि दहेज की मांग को लेकर उसके ससुराल वाले उसके साथ मारपीट कर रहे हैं। 24 वर्षीय दीपिका की उसी दिन मौत हो गई।
मीडिया में आयी खबरों के अनुसार, 21 वर्षीय रंजन, जो इंस्टाग्राम पर 10,000 से अधिक फॉलोअर्स वाली कंटेंट क्रिएटर थीं, ने कथित तौर पर अपनी मृत्यु से लगभग 30 मिनट पहले अपने भाई को फोन किया था। उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन से कुछ सप्ताह पहले तक, वह ऐसे वीडियो पोस्ट कर रही थीं जिनसे मानसिक तनाव और भावनात्मक तौर पर टूटने के संकेत मिल रहे थे।परिवार वाले थोड़ी देर से कार्रवाई क्यों करते हैं?
पुराणिक ने कहा, “बचपन से ही लोग अपनी बेटियों को बताते हैं कि अंततः शादी प्रतिष्ठा का मामला है।”
दिल्ली में 2012 में हुए निर्भया सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले में पीड़िता के परिवार का प्रतिनिधित्व करने वाली उच्चतम न्यायालय की वकील सीमा कुशवाहा ने भी इस बात से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि माता-पिता अपनी बेटियों से उम्मीद करते हैं कि वे “किसी भी कीमत पर शादी को बचाने के लिए सामंजस्य स्थापित करें”।
बंबई उच्च न्यायालय की वकील आभा सिंह कहती हैं, “दहेज को लेकर अब कोई सामाजिक कलंक या सामाजिक बहिष्कार नहीं है। दहेज अब कई रूपों में लिया जाता है। यह फाइव-स्टार शादी है, डेस्टिनेशन वेडिंग है, मेहमानों के लिए चार्टर्ड फ्लाइट्स हैं, और भी बहुत कुछ। यह सामान्य हो गया है, क्योंकि यह एक स्टेटस सिंबल बन गया है।”
त्वरित न्याय से हालात बदलने में मदद मिल सकती है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है।
कुशवाहा ने कहा कि खराब फॉरेंसिक रिपोर्ट, सबूतों का संग्रह, आरोप पत्र में गलत धारा, महिला के परिवार से अलगाव और लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों के कारण दोषसिद्धि दर कम होती है, जिससे अपराधियों का हौसला और बढ़ जाता है।