उच्च न्यायालय ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 28 हफ्ते का गर्भ समाप्त करने की अनुमति दी

राष्ट्रीय
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नयी दिल्ली: 25 जून (ए) दिल्ली उच्च न्यायालय ने 15 वर्षीय एक दुष्कर्म पीड़िता को अपना 28 हफ्ते का गर्भ चिकित्सकीय देखरेख में समाप्त करने की इजाजत दे दी है।

अदालत ने कहा कि कानून 24 हफ्ते के बाद के गर्भ को समाप्त करने की इजाजत नहीं देता है, लेकिन किशोरी को पहुंचे गंभीर मानसिक सदमा को देखते हुए ऐसी इजाजत दी जा सकती है।हालांकि, न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की अवकाशकालीन पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर इस मामले में शिशु जीवित पैदा होता है, तो अधिकारियों को बच्चे को मेडिकल मदद मुहैया करनी होगी, बाल कल्याण समिति की सहायता लेनी होगी तथा अगर किशोरी और उसके पिता चाहें, तो बच्चे को गोद देने की व्यवस्था करनी होगी।

पीठ ने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को निर्देश दिया कि वह डीएनए जांच के लिए भ्रूण के उत्तक को सुरक्षित रखे, जिसकी जरूरत आपराधिक मामले में पड़ेगी।

‘जीवन का अधिकार’ का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ता (पीड़िता) ने – जिसने अपने पिता के मार्फत याचिका दायर की थी – अदालत को बताया कि वह अपने करीब 26-28 हफ्ते की गर्भ को समाप्त करना चाहती है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि गर्भ जारी रखने से उसे गंभीर मानसिक आघात पहुंचेगा।

अदालत ने 24 जून को दिये अपने आदेश में कहा, ‘‘याचिकाकर्ता को इस आदेश के आधार पर अपना गर्भ समाप्त कराने के लिए एम्स, नयी दिल्ली में भर्ती होने की अनुमति दी जाती है। गर्भ समाप्त करने की प्रक्रिया चिकित्सकों की एक टीम द्वारा (कानून के अनुसार) पूरी की जाए।’’

अदालत ने कहा, ‘‘अगर बच्चा जीवित पैदा होता है, तो एम्स, नयी दिल्ली के चिकित्सा अधीक्षक (दिल्ली सरकार के) अधिकारियों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि बच्चे को मेडिकल सहायता और हर मुमकिन मदद मिले, और इनक्यूबेटर में रखा जाए।’’

एम्स ने अपनी मेडिकल रिपोर्ट में यह राय दी थी कि गर्भ जारी रखने से किशोरी पर प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक असर पड़ने की संभावना है।

दिल्ली सरकार ने कहा कि एम्स की स्पष्ट रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए, उसे इस मामले में गर्भ को चिकित्सकीय देखरेख में समाप्त करने की प्रक्रिया किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि गर्भ खत्म करने की पीड़िता और उसके पिता की इच्छा तथा मेडिकल बोर्ड की राय को ध्यान में रखते हुए याचिका मंजूर की जाती है।

अदालत ने कहा कि गर्भ खत्म करने और याचिकाकर्ता के अस्पताल में रहने का खर्च दिल्ली सरकार उठाएगी।