नेपाल बाढ़: बचकर निकले लोगों ने सुनाई सैलाब से संघर्ष की दास्तां

अंतरराष्ट्रीय
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काठमांडू: 29 अगस्त (ए) नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच कीचड़ से लथपथ एक बुजुर्ग महिला को खुदाई करने वाली मशीन के अगले हिस्से में बैठाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाने की तस्वीरें असाधारण तरीके से जान बचाने की घटनाओं का प्रतीक बन गई हैं।

गुना माया बोहरा (97) को चार घंटे के बचाव अभियान के बाद उनके वृद्धाश्रम के मलबे से जीवित बाहर निकाला गया। बोहरा का इलाज कर रहे डॉक्टरों ने बताया कि अस्पताल में उनकी हालत में सुधार हो रहा है। बोहरा के रिश्तेदार दीपक ने ‘बीबीसी नेपाली’ से कहा कि वह ऐसी ‘‘योद्धा’’ लग रही थीं, जो युद्ध में जीत हासिल करके लौटी हों।उनकी कहानी नेपाल के बाढ़ से तबाह हुए इलाकों में जीवित बचे लोगों की कई कहानियों में से एक है जहां लोग डूबती बस्तियों से भागकर पहाड़ियों पर शरण लेने और बचाव दल के पहुंचने तक जंगलों में फंसे रहकर रातें बिताने को मजबूर हुए।

नेपाल में भीषण बाढ़ से मरने वालों की संख्या शनिवार को 600 के पार पहुंच गई। वहीं, 2,400 से अधिक लोग अब भी लापता हैं और बचाव दल तलाश एवं राहत अभियान जारी रखे हुए हैं।नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित तिमुरे शहर में सीमा शुल्क एजेंट के रूप में काम करने वाले राजू बुधाथोकी के लिए मुसीबत तब शुरू हुई, जब बुधवार सुबह अचानक बड़ा सैलाब आया।

‘द काठमांडू पोस्ट’ के अनुसार, उस समय अपने कमरे में आराम कर रहे बुधाथोकी को पहले लगा कि भूकंप आया है। बुधाथोकी बाहर निकलकर पास की एक पुलिस चौकी की ओर भागे, लेकिन वहां पहुंचने पर देखा कि पुलिसकर्मी भी अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे। तारों की बाड़ पार करते समय उनके हाथ में चोट लग गई।

अखबार के अनुसार, पीछे मुड़कर देखने पर बुधाथोकी ने देखा कि तिमुरे बाजार के मकान बाढ़ के पानी में एक के बाद एक बहते जा रहे थे और कुछ मकान तो कुछ ही सेकंड में नदी में समा गए।

बुधाथोकी आखिरकार करीब 500 मीटर ऊपर पहाड़ी पर स्थित एक जंगल तक पहुंचे, जहां उन्हें सुरक्षित जगह मिल गई। त्रिशूली के अस्पताल में भर्ती बुधाथोकी ने अखबार को बताया, ‘‘जब मैंने जंगल से नीचे तिमुरे की ओर देखा तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि मुझे इस तरह जिंदगी का दूसरा मौका मिलेगा।’’

एक अन्य सीमा शुल्क एजेंट प्रकाश गौतम भी तिमुरे से निकलने में सफल रहे और उन्होंने जंगल में रात बिताई।

गौतम ने ‘द काठमांडू पोस्ट’ को बताया कि बाजार में अंधेरा छाने और आसमान पर काले बादल मंडराने से पहले उन्होंने तेज गड़गड़ाहट जैसी आवाज सुनी। वह यह जाने बिना कि किस दिशा में जाना है, अपने कमरे से बाहर भागते गए।

अखबार के अनुसार, भागने के दौरान गौतम के बाएं पैर की उंगली में चोट लग गई, लेकिन वह किसी तरह बस्ती के ऊपर स्थित जंगल तक पहुंच गए। गौतम ने बताया कि वहां से उन्होंने बाढ़ के पानी में बिखरे और तैरते हुए शव देखे तथा अपनी आंखों के सामने तिमुरे को मलबे में तब्दील होते देखा।

‘द काठमांडू पोस्ट’ के अनुसार, दिन में बचाव नहीं हो पाने के कारण गौतम और अन्य लोगों ने बुधवार की रात जंगल में ही बिताई। उन्होंने नेपाली सेना के हेलीकॉप्टर से गिराए गए नूडल्स के पैकेट खाकर रात गुजारी।

बृहस्पतिवार सुबह करीब 10 बजे सेना का एक अन्य हेलीकॉप्टर पहुंचा और उन्हें बिदुर ले गया। गौतम ने अखबार को बताया, ‘‘हेलीकॉप्टर में बैठने के बाद ही मुझे एहसास हुआ कि मैं वास्तव में बच गया हूं।’’

वहीं, दोलखा के तुलसी बहादुर भंडारी के लिए जिंदगी बचने की कहानी बिल्कुल अलग थी।

भंडारी जब जान बचाने के लिए भाग रहे थे, तभी कीचड़ और बाढ़ के पानी का तेज बहाव बस्ती में आ गया। उनके भागते समय मकान एक के बाद एक ढहने लगे।

बाढ़ के तेज बहाव में भंडारी पहाड़ी की तरफ फेंका गए। भंडारी ने अखबार को बताया, ‘‘अगर पानी का बहाव मुझे ढलान की ओर नहीं फेंकता तो आज मैं जिंदा नहीं होता।’’

एक अन्य जीवित बचे व्यक्ति सचिन खाती इस आपदा से लगभग संयोगवश बच निकले।खाती (33) अपनी पत्नी और चार वर्षीय बेटे के साथ रसुवा में आभूषण का कारोबार करने वाले अपने मामा राज कुमार दियाली के घर ठहरे हुए थे।

बुधवार सुबह बाढ़ आने से पहले दियाली ने खाती को काम के सिलसिले में चिलिमे भेज दिया था। बाढ़ की सूचना मिलने के बाद खाती तुरंत वापस लौटे।

खाती ने ‘कांतिपुर’ अखबार को बताया, ‘‘जब मैं बाढ़ की खबर सुनकर जल्दबाजी में आया तो जिस गांव में मैं ठहरा हुआ था, वह पहले ही बह चुका था।’’ खाती ने बताया कि उनकी पत्नी, बेटा और दियाली का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।

श्रमिक सुजल थापा (21) रसुवा जिले के उत्तरगया गांव से बचाए जाने के बाद काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल में उपचार करा रहे हैं।

थापा ने  ‘ऑनलाइनखबर डॉट कॉम’ को बताया, ‘‘मैं सो रहा था और मुझे पता ही नहीं चला कि बाढ़ कब आ गई। बाढ़ का पानी मुझे मेरे घर से कई मीटर दूर बहाकर ले गया, जहां कई घंटे बाद सुरक्षा कर्मियों ने मुझे खोजा और बचाया।’’

थापा को अपनी मां के बारे में कोई जानकारी नहीं है। हालांकि, उनके पिता अब भी रसुवा के एक गांव में हैं और थापा को उम्मीद है कि वह उनसे मिल पाएंगे।