मुस्लिम महिलाओं के लिए असमान उत्तराधिकार को चुनौती संबंधी याचिका पर केंद्र जवाब दे: शीर्ष अदालत

राष्ट्रीय
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नयी दिल्ली: 23 सितंबर () उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुसलमानों में लैंगिक भेदभाव पर आधारित विरासत और उत्तराधिकार संबंधी अलिखित नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा।

उच्चतम न्यायालय ने युवा मामले और खेल मंत्रालय तथा कानून और न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी करते हुए इम्तियाज़हुसैन शहाबुद्दीन मुल्ला की याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई।

याचिका में कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था लिंग-आधारित भेदभाव को संस्थागत बनाती है, क्योंकि इसमें महिला उत्तराधिकारियों को उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में विरासत का आधा हिस्सा ही मिलता है और उन्हें पैतृक एवं पारिवारिक संपत्ति में समान अधिकार नहीं दिए जाते हैं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने वकील एम. सिंह और अनिल सी. निशानी की दलीलों पर ध्यान दिया कि इस तरह का असमान व्यवहार संविधान के अनुच्छेदों 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव के खिलाफ़ रोक) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

निशानी ने कहा कि व्यक्तिगत कानून संवैधानिक समीक्षा से यह कहते हुए छूट का दावा नहीं कर सकते कि वे व्यक्तिगत कानून हैं। यदि कोई प्रावधान स्पष्ट रूप से मनमाना है तो उसकी संवैधानिक वैधता की जांच की जा सकती है। उन्होंने इसकी तुलना उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक ‘शायरा बानो’ फैसले से की।

याचिका में उच्चतम न्यायालय से मुसलमानों के बीच संपत्ति और उत्तराधिकार के मामले में स्त्री-पुरुष के लिए समान अधिकारों पर एक आधिकारिक निर्णय देने का अनुरोध किया गया है।

याचिका में उच्चतम न्यायालय से निर्देश देने का अनुरोध किया गया है ताकि मुस्लिम महिलाओं को पैतृक और पारिवारिक संपत्ति समेत विरासत और उत्तराधिकार के समान अधिकार मिल सकें।

इस याचिका में मुस्लिम उत्तराधिकार (बिना वसीयत के) से जुड़े सिद्धांतों के लगातार लागू रहने और उन्हें कानूनी मान्यता मिलने को चुनौती दी गई है, क्योंकि आरोप है कि इनके कारण पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के संपत्ति के अधिकारों में अंतर होता है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, और खासकर इसके 2005 के संशोधन का हवाला देते हुए याचिका में हिंदू संयुक्त परिवार की संपत्ति में बेटियों के लिए समान सह-उत्तराधिकार की कानूनी मान्यता का ज़िक्र किया गया। इसमें कहा गया कि मुस्लिम उत्तराधिकार कानून में ऐसे सुधार न होने से विरासत के अधिकारों में असमानता पैदा होती है।