सरकारी कर्मचारी के लिए सेवा से बर्खास्तगी मृत्युदंड से कम नहीं : उच्चतम न्यायालय

राष्ट्रीय
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नयी दिल्ली: 19 अक्टूबर (ए) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करना उसके लिए मृत्युदंड से कम नहीं है। न्यायालय ने इसके साथ ही तमिलनाडु के पेरियार विश्वविद्यालय के एक उप कुलसचिव को बहाल करने का निर्देश दिया, जिन्हें आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ के आदेश को रद्द करते हुए एकल न्यायाधीश के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें आर. सरवणन की सेवा बहाल की गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा गठित एक सदस्यीय आयोग की जांच रिपोर्ट से पता चलता है कि अपीलकर्ता को बिना किसी सबूत के दोषी ठहरा दिया गया। पीठ ने कहा कि केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किसी व्यक्ति को ‘फांसी पर लटका देने’ से बड़ी उसके साथ और क्या नाइंसाफी हो सकती है।

न्यायालय ने कहा कि खंडपीठ ने किसी ठोस और उचित कारण के बिना एकल न्यायाधीश के फैसले में हस्तक्षेप किया।

उच्चतम न्यायालय की पीठ ने 16 अक्टूबर को पारित अपने आदेश में कहा, ‘‘सेवा से बर्खास्तगी या हटाने की सजा सबसे कठोर दंड है और सरकारी कर्मचारी के लिए यह मृत्युदंड से कम नहीं है। इसके दूरगामी प्रभाव होते हैं और यह कर्मचारी के परिवार को भी प्रभावित करती है।’’

उसने कहा कि सेवा समाप्त करने के ऐसे आदेश से सरकारी कर्मचारी सेवा से जुड़े उन सभी लाभों से वंचित हो जाता है, जिन्हें उसने अपनी नौकरी के दौरान अर्जित किया होता है और वह आर्थिक रूप से असहाय हो जाता है।

पीठ ने कहा, ‘‘जब इसके इतने गंभीर परिणाम होते हैं, तो रिट अदालत मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। उपयुक्त मामलों में रिट अदालत को अपनी ओर से लगाई गई सीमाओं से बाहर आकर दंड के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करनी चाहिए।’’

शीर्ष अदालत ने विश्वविद्यालय की इस दलील को खारिज कर दिया कि एकल न्यायाधीश को रिट क्षेत्राधिकार के तहत मामले की सुनवाई करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि संबंधित कर्मचारी के पास तमिलनाडु सेवा नियमों के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एकल न्यायाधीश को यह बताने के लिए किसी न्यायिक फैसले के संदर्भ की जरूरत नहीं थी कि रिट अदालत की शक्तियों पर कुछ स्व-निर्धारित सीमाओं को छोड़कर कोई प्रतिबंध नहीं है।

पीठ ने कहा, ‘‘ये शक्तियां भले ही विवेकाधीन हों, लेकिन उच्च न्यायालय न्याय, निष्पक्षता और सुविवेक को आगे बढ़ाने के लिए संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकता है।’’

उसने कहा, “न्यायिक समीक्षा की शक्तियों का प्रयोग उच्च न्यायालय द्वारा विभागीय प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश में वैधता, अतार्किकता या प्रक्रियात्मक रूप से कुछ अनुचित हो तो उसकी जांच करने के लिए भी किया जाता है।”