छोटे-मोटे आपराधिक मामले के आधार पर चयनित अभ्यर्थी को नौकरी से मना नहीं किया जा सकता : अदालत

उत्तर प्रदेश लखनऊ
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लखनऊ: 25 मार्च (ए)) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुधवार को अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि मामूली आपराधिक मामले में आरोपी होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को सरकारी नौकरी देने से मना नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब उसने उस मामले के बारे में जानकारी दी हो।

यह आदेश उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार ने राकेश कुमार वर्मा नाम के एक व्यक्ति की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

याचिका के अनुसार वर्मा को उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने कनिष्ठ सहायक के पद के लिए चुना था और वह चिकित्सा जांच में भी उपयुक्त पाए गए थे। लेकिन उनके खिलाफ चल रहे एक आपराधिक मामले की वजह से उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि प्राथमिकी को ध्यान से देखने पर ज्ञात होता है कि उसमें परिवार के सभी सदस्यों पर दहेज मांगने के केवल आम और अस्पष्ट आरोप लगाए गए हैं और वर्मा की कोई खास भूमिका नहीं बताई गई है।

याचिका में यह भी दलील दी गई कि इस मामले में जिन अपराधों का जिक्र है जैसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए (पत्नी के साथ क्रूरता), 323 (साधारण चोट पहुंचाना), 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) और 506 (आपराधिक धमकी) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 , वे भले ही संज्ञेय हों लेकिन मौजूदा तथ्यों के आधार पर वे इतने गंभीर नहीं हैं कि वर्मा को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य ठहराया जा सके।

अदालत ने याचिका को मंजूर करते हुए टिप्पणी की कि आरोप छोटे-मोटे किस्म के लगते हैं और ये एक घरेलू झगड़े से जुड़े हैं जिनका संबंधित पद के कर्तव्यों के निर्वहन से कोई लेना-देना नहीं है।