प्रयागराज (उप्र): दो फरवरी (ए)
) उत्तर प्रदेश में जाली प्रमाण पत्रों के आधार पर सहायक अध्यापक के पदों पर नियुक्ति हासिल करने के मामलों का संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को ऐसी नियुक्तियों की एक समग्र जांच करने का निर्देश दिया है।
उच्च न्यायालय ने राज्य के प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) को यह कवायद छह महीने के भीतर पूरी करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि न केवल अवैध नियुक्तियां रद्द की जाए, बल्कि वेतन भी वसूला जाए और मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
देवरिया की गरिमा सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा कई सर्कुलर और निर्देश जारी करने के बावजूद, शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जिम्मेदार अधिकारी ऐसी अवैध नियुक्तियों के खिलाफ प्रभावी और समय पर कार्रवाई करने में विफल रहे हैं.
कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता न केवल धोखाधड़ी को बढ़ावा देती है, बल्कि शिक्षा प्रणाली की जड़ों पर भी प्रहार करती है, जिससे छात्रों के हितों को गंभीर नुकसान होता है, जो इस कोर्ट के लिए सबसे महत्वपूर्ण और सर्वोपरि है.
याचिका में देवरिया के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा उनकी नियुक्ति रद्द करने के आदेश को चुनौती दी गई थी. बीएसए ने याची के शैक्षणिक और निवास संबंधी दस्तावेज जाली पाए जाने के आधार पर उसकी नियुक्ति रद्द कर दी. याची का कहना था कि उन्हें जुलाई, 2010 में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्त किया गया, जब उनके दस्तावेज़ों की जांच की गई थी.
उन्होंने बिना किसी शिकायत के लगभग 15 साल तक सेवा की थी. याची का कहना था कि बीएसए का आदेश मनमाना, अवैध था और बिना सुनवाई का अवसर दिए या किसी रिश्तेदार की शिकायत के आधार पर उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना पारित किया गया. दूसरी ओर, राज्य ने उन्हें एक नोटिस जारी किया, जिसका उन्होंने न तो कोई जवाब दिया और न ही कोई दस्तावेज़ पेश किया, जिससे यह साबित हो सके कि नियुक्ति के समय जमा किए गए शैक्षिक प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और अन्य संबंधित दस्तावेज़ असली हैं.
राज्य सरकार की ओर से कहा कहा गया कि अगर नौकरी धोखे वाले दस्तावेजों या तथ्यों को छिपाकर हासिल की गई है तो ऐसे धोखे का फायदा उठाने वाला व्यक्ति उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियम, 1999 के तहत किसी भी जांच की मांग नहीं कर सकता. इन दलीलों के बाद जब कोर्ट ने आदेश देना शुरू किया तो याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि चूंकि अपील दायर करने का वैकल्पिक उपाय है, इसलिए वह इस याचिका पर ज़ोर नहीं देना चाहते.
हालांकि, बेंच ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया, क्योंकि उसने पाया कि जहां याचिका में सुनवाई का मौका न देने का आधार लिया गया, वहां वैकल्पिक उपाय का होना कोई रोक नहीं है. कोर्ट ने रिट याचिका खारिज करते हुए कहा कि बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता, प्रिंसिपल सेक्रेटरी, बेसिक शिक्षा को आदेश देते हुए कोर्ट ने पूरे राज्य में सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों की व्यापक और समयबद्ध जांच करने का निर्देश दिया है.
कोर्ट ने कहा कि ऐसे लोग सालों तक संस्थानों के मैनेजमेंट के साथ खुलेआम मिलीभगत करके और कई मामलों में संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी की मिलीभगत या मौन स्वीकृति से सेवा में बने रहते हैं. कोर्ट ने ऐसे अधिकारियों के खिलाफ भी कड़ी अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई का निर्देश दिया, जो ऐसी धोखे वाली नियुक्तियों में शामिल पाए गए, जिन्होंने इसमें मदद की या जानबूझकर इसे नज़रअंदाज़ किया।