नयी दिल्ली: छह फरवरी (ए)
) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को यह कहते हुए कि ‘‘यह एक नया दौर’’ है, संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रेस की आजादी के अधिकारों और अनुच्छेद 21 के तहत किसी व्यक्ति के सम्मान, निजता और भुलाए जाने के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने एक मीडिया हाउस की उस याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती दी गई है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के रोक लगाने वाले उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें उस आरोपी से जुड़ी खबरों के प्रसारण और प्रकाशन पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था, जिसे एक आपराधिक मामले में आरोप-मुक्त कर दिया गया है।
उच्च न्यायालय ने 18 दिसंबर, 2025 को मीडिया संस्थानों को उक्त व्यक्ति से जुड़ी खबरें हटाने का निर्देश दिया था, साथ ही मानहानि के मुकदमे में निचली अदालत द्वारा जारी किए गए रोक के आदेश को भी बरकरार रखा था।
उच्चतम न्यायालय ने उस व्यक्ति को नोटिस जारी किया है, जिसने ‘भुला दिए जाने’ के निर्देश का अनुरोध किया है। साथ ही अन्य मीडिया संस्थानों से भी मामले में 16 मार्च तक जवाब मांगा है।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि 18 दिसंबर के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को मिसाल नहीं माना जाएगा, हालांकि इसने मानहानि की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती देने वाले मीडिया हाउस की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने कहा कि भुलाए जाने का अधिकार (राइट टू बी फॉरगॉटन) ऑनलाइन खबरों पर लागू नहीं किया जा सकता।
दातार ने न्यायालय से इस मुद्दे पर फैसला करने की अपील की, क्योंकि मद्रास, राजस्थान और पंजाब एवं हरियाणा जैसे कई उच्च न्यायालय इस मुद्दे पर अपनी राय दे चुके हैं।
दातार ने कहा कि 2017 के केएस पुट्टास्वामी मामले में कहा गया है कि निजता के अधिकार में पुरानी चीजें मिटाने का अधिकार शामिल नहीं है।
पीठ ने दातार से पूछा कि अगर मीडिया हाउस उसी खबर को बार-बार दोहराते हैं तो क्या होगा, और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) या अनुच्छेद 21 के तहत कौन सा अधिकार मान्य होगा।
दातार ने जवाब दिया कि अखबारों में भी, एक बार छपने के बाद खबर बरकरार रहती है और विवाद की स्थिति में भी खबर को मिटाया नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को निचली अदालत से आरोपमुक्त कर दिया जाता है और उस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाती है, तो भी मामला पूरी तरह से चर्चा में बना रहता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘यह नया दौर है। अब, लोग सोशल मीडिया के जमाने में भुला दिया जाना चाहेंगे। ऑनलाइन कई मानहानिकारक कंटेंट बनाए जा रहे हैं। यह दिलचस्प मामला है। हम इस पर गौर करेंगे।’’
देश के कई बड़े मीडिया संस्थानों को इस याचिका में पक्षकार बनाया गया है।
भुलाए जाने का अधिकार, वह डिजिटल अधिकार है जो किसी व्यक्ति को इंटरनेट, सर्च इंजन या डेटाबेस से अपनी पुरानी, अप्रासंगिक, या संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी/रिकॉर्ड को हटाने की मांग करने की अनुमति देता है।