नयी दिल्ली: 25 सितंबर (ए) उच्चतम न्यायालय ने बलात्कार के मामले में 10 साल की सज़ा पाने वाले एक व्यक्ति को बरी करते हुए शुक्रवार को कहा कि सिर्फ़ किसी काम के अनैतिक होने के आधार पर, बिना ठोस सबूत के, किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कथित पीड़िता के बयान को ‘‘बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं’’ बताते हुए, कहा कि उसके बयान को आंशिक रूप से स्वीकार और आंशिक रूप से अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
पीठ ने उस व्यक्ति की अपील पर फ़ैसला सुनाया, जिसने लुधियाना की निचली अदालत द्वारा उसे दोषी ठहराने एवं सजा सुनाए जाने के फैसले को बरकरार रखने के पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के सितंबर 2013 के निर्णय को चुनौती दी थी।
शीर्ष अदालत ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि धारा 376 के तहत दोषी ठहराने का निचली अदालत का फैसला ‘‘पूरी तरह गलत’’ था, और उच्च न्यायालय ने भी इसे मानकर गलती की।
इसने निचली अदालत और उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया तथा कहा कि अपीलकर्ता को भादंसं की धारा 376 के तहत लगे आरोपों से मुक्त किया जाता है।
