लंदन, सात नवंबर (द कन्वरसेशन) अमेरिका के 2026 के चुनावों में महिलाओं ने अपनी ताकत का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई। महंगाई और बढ़ती घरेलू लागत से लेकर प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों पर पाबंदियों तक, कई मुद्दों को लेकर महिलाओं में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के प्रति नाराजगी साफ नजर आई, जिसका असर मतदान के रुझान में भी दिखा। महिलाओं ने बड़ी संख्या में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों का समर्थन किया और खुद भी रिकॉर्ड संख्या में चुनाव जीतकर अमेरिकी राजनीति में नया इतिहास रचा।
डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट की सात सीटें अपने पाले में कर निर्णायक बहुमत हासिल कर लिया। प्रतिनिधि सभा में भी यही रुझान देखने को मिला, जहां डेमोक्रेटिक पार्टी को 258 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी को 177 सीटों से संतोष करना पड़ सकता है।
डेमोक्रेटिक पार्टी की इस ‘ब्लू वेव’ यानी जीत की लहर में महिला मतदाताओं की भूमिका बेहद अहम रही।
‘ब्लू वेव’ अमेरिकी राजनीति में इस्तेमाल होने वाला शब्द है। अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी का पारंपरिक राजनीतिक रंग नीला है। इसलिए जब किसी चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी को बड़े पैमाने पर समर्थन मिलता है और वह कई सीटों पर जीत हासिल करती है, तो इस रुझान को ‘ब्लू वेव’ यानी डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में जीत की लहर कहा जाता है।
अनुमान है कि चुनाव में करीब 6.4 करोड़ महिलाओं ने मतदान किया, जबकि पुरुष मतदाताओं की संख्या 5.6 करोड़ रही। इस तरह कुल मतदान करने वालों में महिलाओं की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत रही।
मतदान के बाद किए गए सर्वेक्षणों (एग्जिट पोल) के मुताबिक, 61 प्रतिशत महिलाओं ने डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों को वोट दिया, जबकि 38 प्रतिशत ने रिपब्लिकन पार्टी का समर्थन किया। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव की तुलना में यह डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में 13 प्रतिशत अंकों का बदलाव था।
यह बदलाव ज्यादातर चुनावी सर्वेक्षणों के अनुमान से भी बड़ा रहा। चुनाव से पहले किए गए सर्वेक्षणों में 56 प्रतिशत अमेरिकी महिलाओं ने डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों को पसंद करने की बात कही थी, जबकि 37 प्रतिशत महिलाओं ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों के प्रति समर्थन जताया था। इन आंकड़ों से डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में नौ प्रतिशत अंकों के बदलाव का अनुमान लगाया जा रहा था।
कई मतदाता समूहों में डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रदर्शन खास तौर पर बेहतर रहा। मतदान करने वाली 18 से 29 वर्ष की महिलाओं में से अनुमानित 70 प्रतिशत ने डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवारों को चुना। 2024 में यह आंकड़ा 61 प्रतिशत था। यानी इस वर्ग में पार्टी का समर्थन नौ प्रतिशत अंक बढ़ा।
अश्वेत महिलाओं के भारी बहुमत यानी 93 प्रतिशत ने भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को वोट दिया, जबकि केवल छह प्रतिशत ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन किया। इसी तरह लैटिनो समुदाय की 68 प्रतिशत और हिस्पैनिक समुदाय की 74 प्रतिशत महिलाओं ने डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में मतदान किया। इन दोनों समूहों में रिपब्लिकन पार्टी को क्रमशः 30 प्रतिशत महिलाओं का समर्थन मिला। वर्ष 2024 की तुलना में अश्वेत महिलाओं के बीच डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन पांच प्रतिशत अंक बढ़ा। हालांकि, हिस्पैनिक महिलाओं के बीच यह बदलाव कहीं ज्यादा बड़ा रहा। इस वर्ग में डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थन में 28 प्रतिशत अंकों की वृद्धि दर्ज की गई।
महिलाओं ने सिर्फ बड़ी संख्या में मतदान ही नहीं किया, बल्कि इस बार वे ऐतिहासिक संख्या में चुनाव जीतकर भी सामने आईं। न्यू मैक्सिको में डेब हालांड ने जीत दर्ज की। इसके साथ ही वह अमेरिका के किसी राज्य की गवर्नर चुनी जाने वाली पहली अमेरिकी मूल निवासी महिला बन गईं। वहीं, जॉर्जिया में जीत हासिल करने वाली कीशा लांस बॉटम्स किसी अमेरिकी राज्य की गवर्नर बनने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं।
जूलियाना स्ट्रैटन के चुनाव जीतने के बाद इलिनॉय ऐसा पहला राज्य बन गया है, जिसका सीनेट में एक साथ दो अश्वेत महिला सांसद प्रतिनिधित्व करेंगी। स्ट्रैटन मौजूदा सीनेटर टैमी डकवर्थ के साथ काम करेंगी। इसके अलावा, कई ऐसे राज्यों में भी महिलाओं ने पहली बार गवर्नर पद के लिए जीत हासिल की, जहां दशकों से रूढ़िवादी विचारधारा के प्रतिनिधियों का दबदबा रहा है।
जॉर्जिया, मिनेसोटा, टेनेसी और ओहायो ने अपनी पहली महिला गवर्नर चुनीं। वहीं, साउथ कैरोलाइना में एनी एंड्रयूज चुनाव जीतकर राज्य से अमेरिकी सीनेट में पहुंचने वाली पहली महिला बनीं। अमेरिकी इतिहास में पहली बार प्रतिनिधि सभा में एक साथ कम से कम 100 महिलाओं के पहुंचने का अनुमान है।
महिलाओं ने किस वजह से बदला अपना वोट?
चुनावों के नतीजों के पीछे मतदाताओं में रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दों को लेकर व्यापक नाराजगी रही। इनमें सबसे अहम मुद्दा लगातार बढ़ती महंगाई और जीवनयापन की लागत थी।
अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय व्हाइट हाउस की ओर से दुनिया भर के देशों पर लगाए गए शुल्क (टैरिफ) और ईरान के साथ महंगे युद्ध ने इस समस्या को और बढ़ा दिया। संघर्ष शुरू होने के बाद से अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर रोजमर्रा की वस्तुओं के निर्माण, ढुलाई और वितरण की लागत पर पड़ा। इससे घरों में इस्तेमाल होने वाली जरूरी चीजें भी महंगी हो गईं। अमेरिकी श्रम विभाग की ओर से अक्टूबर में जारी आंकड़ों के मुताबिक, सालाना महंगाई दर अगस्त के 3.4 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 3.7 प्रतिशत हो गई। शोध बताते हैं कि दुनिया भर में महंगाई का असर महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में ज्यादा पड़ता है। विश्व आर्थिक मंच की 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं के वेतन में महंगाई के अनुपात में बढ़ोतरी होने की संभावना पुरुषों की तुलना में कम होती है।
इसी रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि महिलाओं के लिए बनाए या बेचे जाने वाले उत्पादों की कीमतों में आमतौर पर ज्यादा बढ़ोतरी होती है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में 2021 के दौरान महिलाओं के कार्यालय में पहने जाने वाले (फॉर्मल) जूतों की कीमतों में 75 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि पुरुषों के जूतों की कीमतें केवल 14 प्रतिशत बढ़ीं। कई अन्य उत्पादों में भी यही रुझान देखने को मिला।
लंदन स्थित गैर-लाभकारी संगठन ‘विमेन्स बजट ग्रुप’ ने 2026 की शुरुआत में कहा था, ‘‘पिछले संकटों से हम जानते हैं कि कीमतें बढ़ने पर सबसे पहले और सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है। उनकी औसत आमदनी और बचत कम होने के कारण उन्हें अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा जरूरी चीजों पर खर्च करना पड़ता है।’’ संगठन ने कहा, ‘‘गरीबी के झटकों को झेलने की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं पर आ जाती है। वे परिवार का खर्च चलाने के लिए बजट में बार-बार कटौती करती हैं, सस्ती चीजों की तलाश में भटकती हैं, कई बार भोजन छोड़ देती हैं और अपनी जरूरतों से समझौता करती हैं।’’
महंगाई की मार झेलने के अलावा, अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की उन नीतियों को लेकर भी महिलाओं में भारी नाराजगी है, जिन्हें उनकी स्वतंत्रता और उन्हें मिलने वाली सहायता सुविधाओं पर हमला माना जा रहा है। इनमें प्रजनन और परिवार स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए मिलने वाली आर्थिक सहायता में कटौती के साथ-साथ आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) यानी टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक से प्रजनन उपचार और गर्भपात सेवाओं तक पहुंच सीमित करना शामिल है।
दक्षिणपंथी विचारधारा पर आधारित इन कानूनी पाबंदियों का अमेरिका की महिलाओं पर सीधा असर पड़ा है।
यौन और प्रजनन स्वास्थ्य एवं अधिकारों के लिए काम करने वाले गैर-लाभकारी संगठन ‘इंटरनेशनल प्लांड पेरेंटहुड फेडरेशन’ की महानिदेशक मारिया एंटोनिएटा अल्काल्दे कास्त्रो ने मध्यावधि चुनावों के नतीजे घोषित होने के बाद कहा, “महिलाओं के अधिकारों पर करीब दो साल से हो रहे हमलों, जिनमें अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (यूएसएआईडी) को खत्म करना और परिवार नियोजन कार्यक्रमों का वित्त पोषण रोकना शामिल है, के कारण हमारे फेडरेशन से जुड़े करीब 1,400 क्लीनिक बंद होने को मजबूर हुए हैं। ये मध्यावधि चुनाव उम्मीद की एक किरण हैं। इनसे उम्मीद जगी है कि अब कांग्रेस बची हुई आर्थिक सहायता को सुरक्षित रखेगी, उस पर रोक नहीं लगने देगी और महिलाओं के अधिकारों को हुए नुकसान के लिए जवाबदेही तय करेगी।’’
यह उम्मीद कितनी पूरी होती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन एक बात साफ है कि 2026 के मध्यावधि चुनावों में महिलाओं की भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने न सिर्फ बड़ी संख्या में मतदान करके चुनावी नतीजों को प्रभावित किया, बल्कि कई अहम सीटों पर जीत हासिल कर अमेरिकी राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी भी दर्ज कराई।