नयी दिल्ली: दो मई (ए)
) उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मतगणना के लिए केंद्र सरकार के कर्मियों की तैनाती संबंधी निर्वाचन आयोग के परिपत्र को चुनौती देने वाली तृणमूल कांग्रेस की याचिका पर शनिवार को सुनवाई करते हुए कहा कि इस याचिका पर आगे कोई आदेश आवश्यक नहीं है।
इस याचिका में तृणमूल कांग्रेस ने कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा याचिका खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी है।
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की विशेष पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग (ईसी) मतगणना कर्मियों का चयन कर सकता है और उसके 13 अप्रैल के परिपत्र को गलत नहीं कहा जा सकता है।
निर्वाचन आयोग ने कहा कि परिपत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि केंद्रीय और राज्य सरकार के कर्मचारी संयुक्त रूप से काम करेंगे और तृणमूल कांग्रेस की किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की आशंका निराधार है।
निर्वाचन आयोग ने अदालत को आश्वासन दिया कि परिपत्र का अक्षरशः पालन किया जाएगा।
तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने शुरुआत में कहा था कि परिपत्र 13 अप्रैल का था लेकिन उन्हें इसकी जानकारी 29 अप्रैल को मिली।
पीठ ने याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि निर्वाचन आयोग मतगणना कर्मियों का चयन केवल एक ही समूह अर्थात् केंद्र सरकार से कर सकता है और इसलिए उसके परिपत्र को गलत नहीं कहा जा सकता।
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डी एस नायडू ने कहा कि निर्वाचन अधिकारी राज्य सरकार का कर्मचारी होता है और उसे सरकारी कर्मचारियों के किसी भी समूह से कर्मियों को तैनात करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
इसके बाद सिब्बल ने कहा कि वह चाहते हैं कि परिपत्र को यथावत लागू किया जाए।
न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि यदि वे परिपत्र का अनुपालन चाहते हैं, तो तृणमूल अदालत में क्यों है?
इसके बाद पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि आगे किसी आदेश की आवश्यकता नहीं है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीट के लिए मतदान दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को हुआ। मतगणना चार मई को होगी।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल को निर्वाचन आयोग के परिपत्र के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस की याचिका खारिज करते हुए कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के बजाय केंद्र सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के कर्मचारियों को मतगणना पर्यवेक्षक और सहायक नियुक्त करने के निर्वाचन आयोग के निर्णय में कुछ अवैध नहीं है।