‘क्रांतिवीर’ से ‘वेलकम’ तक: नाना पाटेकर के सबसे यादगार संवाद

मनोरंजन
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मुंबई: आठ अक्टूबर (ए) दर्शकों को बेचैन, भयभीत, रोमांचित और भावुक कर देने वाली आवाज के लिए मशहूर नाना पाटेकर साधारण से संवाद को भी यादगार बनाने की कला जानते थे।

करीब पांच दशक लंबे करियर में दिग्गज अभिनेता ने ऐसे अनगिनत संवाद दिए, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गए।क्रांतिवीर’ के गुस्से से लेकर ‘अब तक छप्पन’ की वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानी और ‘वेलकम’ की सहज हास्य शैली तक, पाटेकर के संवाद उनके अभिनय की विरासत का अहम हिस्सा बन गए।

उनके कुछ सबसे यादगार संवाद इस प्रकार हैं :

1. ‘‘धंधे में कोई किसी का भाई नहीं, कोई किसी का बेटा नहीं’’ — ‘परिंदा’ (1989)

विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ मुंबई के अंडरवर्ल्ड की हिंसा की पृष्ठभूमि पर बनी अपराध कथा थी, जिसमें जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर ने दो भाइयों की भूमिका निभाई थी।

पाटेकर ने फिल्म में अन्ना नाम के निर्मम गैंगस्टर की भूमिका निभाई, जो अपराध की दुनिया पर नियंत्रण रखता था और कारोबार के मामले में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं छोड़ता था। यह संवाद अन्ना की सोच को सामने रखता है कि अंडरवर्ल्ड में मुनाफा ही मायने रखता है और व्यक्तिगत रिश्तों का कोई महत्व नहीं है।

इस फिल्म के लिए पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था और यह उनके करियर के सबसे महत्वपूर्ण अभिनय में गिनी जाती है।

2. ‘‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने’’ — ‘क्रांतिवीर’ (1994)

अगर कोई फिल्म पाटेकर की संवाद को हथियार में बदलने की क्षमता को सबसे अच्छी तरह दिखाती है, तो वह मेहुल कुमार की ‘क्रांतिवीर’ है। इसमें उन्होंने प्रताप नारायण तिलक की भूमिका निभाई थी, जो एक शराबी और निराश व्यक्ति है तथा बाद में भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ संघर्ष करता है।

यह संवाद फिल्म के एक बेहद तनावपूर्ण दृश्य में आता है, जब प्रताप को फांसी दिए जाने से कुछ क्षण पहले उसके आसपास लोगों की भीड़ जमा हो जाती है।

पाटेकर का किरदार मौत के सामने समर्पण करने के बजाय वहां मौजूद लोगों पर ही सवाल खड़ा कर देता है। गुस्से, व्यंग्य और बेखौफ अंदाज के मेल ने इस दृश्य को 1990 के दशक के हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार दृश्यों में शामिल कर दिया।

3. ‘‘बता इसमें मुसलमान का खून कौन सा और हिंदू का कौन सा?’’ — ‘क्रांतिवीर’

‘क्रांतिवीर’ में पाटेकर के राजनीतिक रूप से कई प्रभावशाली संवाद थे, लेकिन यह संवाद शायद सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ फिल्म के संदेश को सबसे बेहतर तरीके से सामने रखता है।

प्रताप का यह सवाल कि क्या कोई मुसलमान और हिंदू के खून में अंतर कर सकता है, अपने सरल तर्क में बेहद प्रभावशाली है। पाटेकर ने इसे ऐसे गुस्से के साथ पेश किया, मानो उन्होंने राजनीतिक और धार्मिक विभाजन से आम लोगों की जिंदगी बर्बाद होते देखी हो।

4. ‘‘सौ में से अस्सी बेईमान, फिर भी मेरा देश महान’’ — ‘क्रांतिवीर’

‘क्रांतिवीर’ का यह संवाद भ्रष्टाचार और देशभक्ति पर पाटेकर के तीखे अंदाज के लिए याद किया जाता है।

यह प्रताप के अपने देश को लेकर जटिल भावों को सामने लाता है। वह देश में फैले भ्रष्टाचार और समस्याओं से नाराज है, लेकिन उसका गुस्सा देश के प्रति उसके प्रेम से ही पैदा होता है।

5. ‘‘एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है’’ — ‘यशवंत’ (1997)

‘यशवंत’ में पाटेकर ने एक ऐसे पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई, जो अपराध, भ्रष्टाचार और नौकरशाही के बीच लगातार अपनी सीमाओं से जूझता है।

इंस्पेक्टर यशवंत लोहार के रूप में पाटेकर ने एक लंबे संवाद में बताया कि कैसे दिखने में छोटी चीजें भी इंसान को बेबस कर सकती हैं। संवाद की शुरुआत में मच्छर का जिक्र दर्शकों को सबसे अधिक याद रहा।

6. ‘‘मौत से बढ़कर कोई दोस्त नहीं है’’ — ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ (1997)

‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ में पाटेकर ने एक ऐसे गैंगस्टर की भूमिका निभाई, जिसकी जिंदगी हिंसा, वफादारी और नियति के इर्द-गिर्द घूमती है।

मौत को सबसे बड़ा दोस्त बताने वाला यह संवाद उसके जीवन के प्रति निराशावादी नजरिये को दर्शाता है। मुस्तफा के लिए मौत सिर्फ डरने की चीज नहीं, बल्कि हमेशा साथ रहने वाली साथी थी।

7. ‘‘हम सब सिस्टम का हिस्सा हैं, सिस्टम डिसाइड करता है, अपन फॉलो करता है’’ — ‘अब तक छप्पन’ (2004)

शिमित अमीन की अपराध फिल्म ‘अब तक छप्पन’ में पाटेकर ने इंस्पेक्टर साधु आगाशे की भूमिका निभाई थी। यह किरदार मुंबई पुलिस के एनकाउंटर से जुड़े मामलों के लिए प्रसिद्ध एक अधिकारी की पृष्ठभूमि से प्रेरित था।

हर व्यक्ति के सिस्टम का हिस्सा होने वाला यह संवाद फिल्म के केंद्रीय संघर्ष को सामने रखता है।

8. ‘‘भगवान का दिया सब कुछ है। दौलत है, शोहरत है, इज्जत है’’ — ‘वेलकम’ (2007)

‘क्रांतिवीर’ और ‘यशवंत’ जैसी फिल्मों में दमदार अभिनय से पहचान बनाने वाले पाटेकर ने अनीस बज्मी की ‘वेलकम’ में गैंगस्टर उदय शेट्टी का किरदार निभाकर एक अलग तरह के दर्शक वर्ग में लोकप्रियता हासिल की।

उन्होंने साबित किया कि वही आवाज और हावभाव दर्शकों को जोरदार तरीके से हंसा भी सकते हैं। दौलत, शोहरत और इज्जत वाला यह संवाद उदय शेट्टी के किरदार की पहचान बन गया। फिल्म में मजनू भाई की भूमिका निभाने वाले अनिल कपूर के साथ उनकी जोड़ी फिल्म के सबसे बड़े आकर्षणों में रही।

9. ‘‘कंट्रोल उदय!’’ — ‘वेलकम’ (2007)

पाटेकर के कुछ सबसे यादगार संवाद लंबे संवाद नहीं थे। ‘‘कंट्रोल उदय!’’ एक ऐसा ही संवाद है, जो बाद में तकियाकलाम बन गया।

यह संवाद उदय शेट्टी की झुंझलाहट को बखूबी सामने लाता है। फिल्म में वह एक तरफ गैंगस्टर की अपनी छवि और दूसरी तरफ अपने साथी मजनू भाई द्वारा पैदा की गई अराजकता के बीच फंसा रहता है।

10. ‘‘आलू ले लो, कांदा ले लो’’ — ‘वेलकम’

‘वेलकम’ के सबसे हास्यास्पद दृश्यों में से एक में पाटेकर का उदय शेट्टी सूट पहनकर सड़क किनारे सब्जी बेचता दिखाई देता है। फिल्म में गैंगस्टर से अभिनेता बने उदय द्वारा शूट की जा रही एक नकली फिल्म का यह हिस्सा था।

पूरी परिस्थितियों में बेतुका हास्य इस दृश्य को यादगार बनाता है और पाटेकर के अंदाज में बोले गए ‘‘आलू ले लो, कांदा ले लो’’ ने साधारण सब्जीवाले की पुकार को भी उदय शेट्टी के एक और यादगार संवाद में बदल दिया।