नयी दिल्ली: पांच नवंबर (ए) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट के एक नेता की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया जिसमें पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश देने का अनुरोध किया गया कि वे बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की अर्जी पर जल्द फैसला लें।
उच्चतम न्यायालय ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाए।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय द्वारा दायर याचिका का निपटारा कर दिया और उनसे कलकत्ता उच्च न्यायालय जाने को कहा।
पीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया गया कि वह इस मामले को सुनवाई के लिए खंडपीठ के समक्ष रखें।
पीठ ने आदेश दिया, “हमें लगता है कि याचिकाकर्ता को कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख करना चाहिए। इसलिए, हम इस चरण में इस याचिका का निपटारा करते हैं और याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय में उचित याचिका दायर करने की छूट देते हैं। हम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध करते हैं कि वह इस मामले को तत्काल विचार के लिए एक खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध करें और मामले का जल्द से जल्द निपटारा करें।”
शुरुआत में, पीठ ने कहा कि (विधानसभा) अध्यक्ष से यह अपेक्षा की जाती है कि वे आठ जुलाई की अयोग्यता याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर फैसला लें।
चट्टोपाध्याय की ओर से पेश वकील ने कहा कि बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिका जुलाई में दायर की गई थी, लेकिन पांच महीने बीत जाने के बाद भी इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
उन्होंने कहा, “हम जल्द से जल्द निपटारे का अनुरोध करते हैं। पश्चिम बंगाल के संबंध में इस अदालत का पहले से ही एक आदेश मौजूद है।”
इस साल आठ जुलाई को पार्टी के विधायकों – ऋतब्रत बनर्जी, फिरहाद हकीम, अरूप रॉय, संदीपन साहा, अखरुज्जमां अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मीन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष – के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएं दायर की गई हैं। इन पर आरोप है कि टीएमसी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद इन्होंने दल बदल लिया था।
भारतीय जनता पार्टी से चुनाव हारने के बाद, इस कदम की वजह से टीएमसी में फूट पड़ गई।
