सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया मंचों पर सब्सक्रिप्शन-आधारित यौन सामग्री पर रोक लगाने के निर्देश दिए

राष्ट्रीय
Spread the love

नयी दिल्ली, 17 अक्टूबर (ए) उच्चतम न्यायालय ने बाल यौन सामग्री की रोकथाम में सोशल मीडिया मंचों की लापरवाही का गंभीर संज्ञान लेते हुए निर्देश दिया है कि प्रत्येक प्लेटफॉर्म यह सुनिश्चित करे कि बच्चों को नुकसान पहुंचा सकने वाली ऐसी कोई भी सामग्री सब्सक्रिप्शन के जरिये अपलोड न की जाए और न ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसे बढ़ावा दिया जाए।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि अदालत ने बार-बार इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि सोशल मीडिया मध्यस्थों और सोशल मीडिया मंचों ने 2024 में जारी किये गए अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया है, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

पीठ ने कहा, ‘‘हर मध्यस्थ को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे ‘पे-वॉल’ या सब्सक्रिप्शन के ज़रिए—चाहे प्रत्यक्ष रूप से या परोक्ष रूप से—बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी कोई भी सामग्री, या बच्चों को नुकसान पहुंचा सकने वाली कोई अन्य सामग्री उपलब्ध न कराई जाए, अपलोड न की जाए, उसे बढ़ावा नहीं दिया जाए या उसका प्रसार न किया जाए।’’

पीठ ने कहा कि न्यायालय ने इस बात की ओर इशारा किया है कि किस तरह सोशल मीडिया एल्गोरिदम के जरिए ऐसी हानिकारक सामग्री के अप्रत्यक्ष लिंक को बढ़ावा दिया और साझा किया जा रहा है। ऐसा करके, साइबर जगत में बच्चों की सुरक्षा के लिए लाये गए विशेष दंडात्मक प्रावधानों — यानी यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की धारा 15 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67बी — की सख्ती से बचा जा रहा है।

न्यायालय ने 15 अक्टूबर को कहा, ‘‘हमारे फैसले को आए दो साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद, ऐसा लगता है कि कोई खास प्रगति नहीं हुई है। बल्कि, हाल में आई खबरों से हमारे बच्चों की सुरक्षा और कल्याण को लेकर एक और भी अधिक चिंताजनक सच्चाई सामने आती है।’’

साथ ही, यह भी कहा गया कि शीर्ष अदालत के संज्ञान में लाई गई खबरों को देखकर उसे गहरा दुख हुआ है।

कई निर्देश जारी करते हुए, पीठ ने कहा कि इतने वर्षों तक न तो नियामक प्राधिकरणों और न ही सोशल मीडिया मध्यस्थों की ओर से कोई गंभीर पहल की गई, इसलिए शीर्ष न्यायालय के पास मामले को अपने हाथों में लेने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था।

न्यायालय ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह आईटी अधिनियम और आईटी नियमों के तहत अपने कर्तव्यों का उल्लंघन करने वाले मध्यस्थों (सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) पर भारी अर्थदंड लगाने के लिए एक रूपरेखा तैयार करने पर विचार करे। अदालत ने कहा कि जुर्माने की राशि तय करते समय उल्लंघन की गंभीरता, उसकी अवधि और बार-बार होने की प्रवृत्ति के साथ-साथ, संबंधित सोशल मीडिया मंचों के आकार और कारोबार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।