अविवाहित बहन पारिवारिक पेंशन की हकदार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

उत्तर प्रदेश लखनऊ
Spread the love

लखनऊ: 28 अक्टूबर (ए) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने बुधवार को एक आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक दिवंगत सरकारी कर्मचारी की अविवाहित बहन को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार किया गया था।

उच्च न्यायालय ने कहा कि वैधानिक सेवा नियमों को सरकारी आदेश से निरस्त नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने संबंधित प्रशासन को छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति मनीष कुमार की एकल पीठ ने शमीम खान की याचिका पर यह आदेश दिया। शमीम खान के दिवंगत भाई ने अपनी सेवा पुस्तिका में उन्हें पारिवारिक पेंशन के लिए नामित किया था।

उनका दावा पांच दिसंबर, 2025 को 23 दिसंबर, 2016 के एक सरकारी आदेश के आधार पर खारिज कर दिया गया था, जिसमें अविवाहित बहन को दिवंगत कर्मचारी के परिवार की परिभाषा से बाहर रखा गया था।

सुनवाई के दौरान, अदालत ने ‘उत्तर प्रदेश सेवानिवृत्ति लाभ नियम, 1961’ के नियम 3(5) का हवाला दिया, जिसमें परिवार की परिभाषा में अविवाहित और विधवा बहनों को शामिल किया गया है।

राज्य सरकार ने भी इस बात से इनकार नहीं किया कि खान दिवंगत कर्मचारी की अविवाहित बहन थीं।

अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए वैधानिक सेवा नियमों में कार्यकारी आदेशों या सरकारी निर्देशों के जरिए कोई बदलाव नहीं किया जा सकता और न ही उन्हें निष्प्रभावी किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि ऐसे नियमों में कोई भी बदलाव निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करके ही किया जाना चाहिए।

खान के दावे को खारिज करने वाले आदेश को रद्द करते हुए, अदालत ने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया कि विभाग कर्मचारी की मृत्यु की तारीख (15 मई 2024) से लेकर वास्तविक भुगतान की तारीख तक की पारिवारिक पेंशन का बकाया, 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ दिलाना सुनिश्चित करे।

अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे इस आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के छह सप्ताह के भीतर भुगतान प्रक्रिया पूरी करें।