नयी दिल्ली, 24 जून (ए
) उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान के निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में शुल्क बहुत ज़्यादा होने का आरोप लगाने वाली एक याचिका पर सुनवाई से बुधवार को इनकार करते हुए कहा कि ‘‘हमें इस देश में चिकित्सकों की जरूरत है।’’
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ राजस्थान उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
उच्च न्यायालय ने एक मेडिकल अभ्यर्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें दावा किया गया था कि राजस्थान के निजी चिकित्सा महाविद्यालयों में वार्षिक शुल्क 18.90 लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) की पात्रता के लिए निर्धारित आठ लाख रुपये की आय सीमा के बिल्कुल विपरीत और असंगत है।
सुनवाई के दौरान, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि स्व-वित्तपोषित संस्थानों को सरकारी संस्थानों के बराबर ही शुल्क लेना चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘‘कोई यह नहीं कह सकता कि निजी संस्थानों में शुल्क बहुत ज़्यादा है और उसे सरकारी संस्थानों के बराबर कर दिया जाए।’’
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने राजस्थान में शुल्क ढांचे का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह 25 लाख रुपये तक है।
पीठ ने कहा कि छात्रों के पास छात्रवृत्ति का लाभ लेने का विकल्प उपलब्ध है। सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘हमें इस देश में चिकित्सकों की जरूरत है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘हमें उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है। अगर कानून से जुड़ा कोई सवाल है, तो उसपर आगे विचार किया जा सकता है।’’
याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय में दलील दी थी कि शुल्क नियामक समिति का दायित्व है कि वह ऐसा शुल्क ढांचा तय करे जो तर्कसंगत, न्यायसंगत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के अभ्यर्थियों की वित्तीय सीमाओं के अनुरूप हो।
याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता ने ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तहत राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा-स्नातक (नीट-यूजी) 2025 में हिस्सा लिया था।